Rudra Suktam- शिव को प्रसन्न करने के लिए अवश्य करें पाठ

Rudra Suktam: रुद्र सूक्तम् वेदों में वर्णित एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, जो भगवान रुद्र (शिव) की स्तुति करता है। यह मुख्य रूप से ऋग्वेद और यजुर्वेद में पाया जाता है और इसमें भगवान रुद्र की शक्तियों, उनके कल्याणकारी और उग्र स्वरूपों का वर्णन किया गया है।

Rudra Suktam: रुद्र सूक्तम् का महत्व

  • भगवान शिव की कृपा प्राप्ति- इस सूक्त के पाठ से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
  • नकारात्मक शक्तियों से रक्षा- यह सूक्त नकारात्मक ऊर्जा, बुरी शक्तियों और संकटों को दूर करने में सहायक माना जाता है।
  • स्वास्थ्य लाभ- आयुर्वेद में रुद्र सूक्त के मंत्रों को रोग निवारण और मानसिक शांति के लिए प्रभावी बताया गया है।
  • पापनाशक- इसका नियमित पाठ पापों का नाश करता है और व्यक्ति को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है।

 

ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः।
बाहुभ्यामुत ते नमः॥१॥

या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि ॥२॥

यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्यस्तवे।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हि सी: पुरुषं जगत् ॥३॥

शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि।
यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्म सुमना असत्॥४॥

अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक् ।
अर्हीश्च सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च
यातुधान्योऽधराचीः परा सुव॥५॥

असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः।
ये चैन रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशोऽवैषा हेड ईमहे॥६॥

असौ योऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः।
उतैनं गोपा अदृश्रन्नदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो मृडयाति नः॥७॥

नमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे।
अथो ये अस्य सत्वानोऽहं तेभ्योऽकरं नमः॥८॥

प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्न्योर्ज्याम्।
याश्च ते हस्त इषवः परा ता भगवो वप॥९॥

विज्यं धनुः कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ२ उत।
अनेशन्नस्य या इषव आभुरस्य निषङ्गधिः॥१०॥

या ते हेतिर्मीढुष्टम हस्ते बभूव ते धनुः।
तयाऽस्मान्विश्वतस्त्वमयमया परि भुज॥११॥

परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः।
अथो य इषुधिस्तवारे अस्मन्नि धेहि तम्॥१२॥

अवतत्य धनुष्ट्व सहस्राक्ष शतेषुधे।
निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः सुमना भव ॥१३॥

नमस्त आयुधायानातताय धृष्णवे।
उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने॥१४॥

मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्।
मा नो वधी: पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः॥१५॥

मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः।
मा नो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमित् त्वा हवामहे॥१६॥

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